जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) 

जॉन स्टुअर्ट मिल (२० मई १८०६ – ८ मई १८७३) एक अंग्रेज़ दार्शनिक, राजनीतिक अर्थशास्त्री और नागरिक सेवक थे। उन्हें उदारतावाद (Liberalism) और उपयोगितावाद (Utilitarianism) के सबसे प्रभावशाली विचारकों में गिना जाता है।


मुख्य कृतियाँ (प्रमुख रचनाएँ)

  • “ऑन लिबर्टी” (On Liberty) – १८५९ – व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण ग्रंथ
  • “यूटिलिटेरियनिज़्म” (Utilitarianism) – १८६१ – उपयोगितावाद का व्यवस्थित प्रतिपादन
  • “द सब्जेक्शन ऑफ़ वीमेन” (The Subjection of Women) – १८६९ – महिलाओं के अधिकारों पर लेख
  • “ए सिस्टम ऑफ़ लॉजिक” (A System of Logic) – १८४३ – तर्कशास्त्र पर प्रभावशाली पुस्तक
  • “प्रिंसिपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल इकॉनमी” (Principles of Political Economy) – १८४८

मुख्य विचार

१. उपयोगितावाद – किसी कार्य की नैतिकता उससे उत्पन्न सुख या खुशी की मात्रा पर निर्भर करती है। परन्तु मिल ने गुणात्मक सुख (qualitative pleasure) पर जोर दिया – बौद्धिक एवं नैतिक सुख को शारीरिक सुख से श्रेष्ठ माना।

२. व्यक्तिगत स्वतंत्रता – व्यक्ति को तब तक पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए जब तक वह दूसरों को हानि न पहुँचाए (हानि सिद्धांत / Harm Principle)।

३. स्त्री-पुरुष समानता – उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और मताधिकार की वकालत की, जो उस समय की बहुत प्रगतिशील सोच थी।

४. बहुमत का अत्याचार – उन्होंने चेतावनी दी कि लोकतंत्र में बहुमत अल्पमत पर अपनी राय थोप सकता है, इसलिए अल्पमत के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है।


आपके द्वारा पूछे गए वाक्य का संदर्भ

आपका मूल प्रश्न था:

“It is better to be a human being dissatisfied than a pig satisfied; better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied.”

यह वाक्य मिल की पुस्तक “यूटिलिटेरियनिज़्म” (अध्याय २) से लिया गया है। इसके माध्यम से वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि सभी सुख समान नहीं होते – बौद्धिक एवं मानवीय सुख (भले ही वह असंतोष लाए) पाशविक या मूर्खतापूर्ण सुख से अधिक मूल्यवान है। यही उनके गुणात्मक उपयोगितावाद का केंद्र है।

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