“Why I Am an Atheist” (मैं नास्तिक क्यों हूँ) — भगत सिंह का यह प्रसिद्ध निबंध है।
पृष्ठभूमि
भगत सिंह ने यह निबंध 5-6 अक्टूबर 1930 को लाहौर सेंट्रल जेल में लिखा था। उस समय वे फांसी की सजा की प्रतीक्षा कर रहे थे।
इसका कारण था जेल में उनके साथ बंद बाबा रणधीर सिंह (घदर पार्टी के सदस्य)। रणधीर सिंह ने भगत सिंह को ईश्वर में विश्वास करने के लिए मनाया। जब भगत सिंह ने इनकार किया, तो बाबा ने गुस्से में कहा — “तुम्हें प्रसिद्धि का घमंड हो गया है, तुम्हारा अहंकार तुम्हारे और ईश्वर के बीच काले पर्दे की तरह खड़ा है।”
इसी आरोप का जवाब देने के लिए भगत सिंह ने यह निबंध लिखा। यह पहली बार 27 सितंबर 1931 को लाहौर के अखबार The People में प्रकाशित हुआ (उनकी फांसी के बाद)।
1. अहंकार वाली बात का खंडन (सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु)
भगत सिंह साफ कहते हैं कि अहंकार से कोई आस्तिक नास्तिक नहीं बन सकता।
- अगर कोई अहंकारी हो तो वह या तो खुद को ईश्वर का प्रतिद्वंद्वी मानेगा, या खुद को ईश्वर घोषित कर देगा।
- दोनों ही मामलों में वह आस्तिक ही रहता है, क्योंकि वह ईश्वर के अस्तित्व को मानता है।
- भगत सिंह कहते हैं — “मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ।” इसलिए यह अहंकार नहीं हो सकता।
2. उनकी नास्तिकता बहुत पुरानी है
- यह दिल्ली बम कांड या लाहौर षड्यंत्र केस के बाद प्रसिद्धि मिलने से नहीं आई।
- वे कहते हैं कि जब वे एक अज्ञात नौजवान थे (कॉलेज के दिनों में), तब भी वे ईश्वर में विश्वास करना छोड़ चुके थे।
- कॉलेज का छात्र इतना घमंडी नहीं हो सकता कि अहंकार के कारण नास्तिक बन जाए।
3. बचपन और युवावस्था का धार्मिक सफर
- दादाजी कट्टर आर्यसमाजी थे।
- वे घंटों गायत्री मंत्र का जाप करते थे और सुबह-शाम प्रार्थना करते थे।
- पिताजी उदार थे लेकिन आस्तिक थे।
- नेशनल कॉलेज में आकर उन्होंने धर्म और ईश्वर पर खुलकर सवाल उठाने शुरू किए, लेकिन तब भी वे आस्तिक थे।
- क्रांतिकारी पार्टी में आने के बाद भी ज्यादातर साथी आस्तिक थे (जैसे सचिंद्रनाथ सान्याल, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी आदि)।
4. अध्ययन से नास्तिकता तक का सफर
- 1925-26 में पार्टी के संकट के समय उन्होंने गहन अध्ययन शुरू किया।
- उन्होंने बाकुनिन की God and the State, मार्क्स, लेनिन, ट्रॉट्स्की आदि को पढ़ा।
- निरालंब स्वामी की किताब Common Sense पढ़ी (जिसे वे रहस्यवादी नास्तिकता कहते हैं)।
- 1926 के अंत तक वे पूरी तरह आश्वस्त हो गए कि कोई सर्वशक्तिमान ईश्वर नहीं है जो ब्रह्मांड को चलाता हो।
5. असली परीक्षा — 1927 की गिरफ्तारी
- मई 1927 में लाहौर में अचानक गिरफ्तार हुए।
- पुलिस ने धमकी दी कि काकोरी केस और दशहरा बम कांड में उन्हें फांसी हो जाएगी।
- पुलिस अफसरों ने उनसे प्रार्थना करने को कहा।
- भगत सिंह ने खुद से कहा — “क्या मैं सिर्फ सुख के दिनों में नास्तिक हूँ, या मुश्किल समय में भी अपने सिद्धांत पर कायम रह सकता हूँ?”
- उन्होंने प्रार्थना नहीं की। यह उनकी असली परीक्षा थी और वे सफल रहे।
6. ईश्वर के अस्तित्व पर तर्कपूर्ण सवाल
भगत सिंह आस्तिकों से कई सवाल पूछते हैं:
- अगर सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ ईश्वर है, तो उसने इतने दुख, गरीबी, अन्याय और त्रासदियों से भरी दुनिया क्यों बनाई?
- वह पाप करने वाले को क्यों नहीं रोकता?
- प्रथम विश्व युद्ध के नेताओं को क्यों नहीं मारा?
- ब्रिटिश लोगों के मन में भारत को आजाद करने की भावना क्यों नहीं जगा देता?
- पूंजीपतियों के दिल में ऐसा भाव क्यों नहीं पैदा करता कि वे उत्पादन के साधन छोड़ दें और मजदूर वर्ग को आजाद कर दें?
7. धर्म और ईश्वर की उत्पत्ति पर उनका विचार
- भगत सिंह मानते थे कि ईश्वर की कल्पना मनुष्य की कमजोरी और सीमाओं से पैदा हुई है।
- जब इंसान मुश्किलों का सामना नहीं कर पाता, तब वह किसी अलौकिक शक्ति का सहारा लेता है।
- कुछ क्रांतिकारी सोचते थे कि शोषकों ने लोगों को गुलाम बनाए रखने के लिए ईश्वर की कल्पना फैलाई। भगत सिंह इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं थे। वे मानते थे कि मुख्य कारण मनुष्य की अपनी कमजोरी है।
8. प्रकृति और जीवन की उत्पत्ति
- वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हैं।
- कहते हैं कि पृथ्वी नेबुला (धूमकेतु जैसे पदार्थों) के संयोग से बनी।
- जानवर और इंसान डार्विन के विकासवाद से आए।
- पूरी प्रगति मनुष्य के प्रकृति से संघर्ष और उसे जीतने के प्रयास से हुई है। कोई चेतन शक्ति इसे नहीं चला रही।
9. मृत्यु और “इनाम” की अवधारणा
- आस्तिक हिंदू पुनर्जन्म में राजा बनने की उम्मीद करता है।
- मुसलमान या ईसाई स्वर्ग की कामना करता है।
- भगत सिंह कहते हैं — “मेरे पास कोई ऐसा इनाम नहीं है। जब रस्सी गले में कसेगी, तब सब खत्म हो जाएगा। मेरी छोटी सी संघर्ष भरी जिंदगी ही मेरा इनाम है।”
- वे बिना किसी स्वार्थ (न इस लोक का, न परलोक का) आजादी के लिए मरने जा रहे हैं।
10. प्रगति के लिए पुरानी मान्यताओं को चुनौती देना जरूरी है
वे लिखते हैं कि जो व्यक्ति प्रगति चाहता है, उसे पुरानी आस्था के हर हिस्से पर सवाल उठाना चाहिए, तर्क करना चाहिए और चुनौती देनी चाहिए। अंधविश्वास समाज को रोकता है।