मानव जीवन के सबसे रहस्यमय प्रश्न की खोज
जब हम सुबह उठते हैं, काम पर जाते हैं, प्रेम करते हैं, धन कमाने की कोशिश करते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं या किसी लक्ष्य का पीछा करते हैं, तो इन सबके पीछे एक अदृश्य शक्ति काम कर रही होती है — इच्छा।
लेकिन कभी आपने सोचा है कि यह इच्छा स्वयं कहाँ से आती है?
भूख लगती है, तो भोजन की इच्छा होती है। प्यास लगती है, तो पानी की इच्छा होती है। सम्मान चाहिए, तो सफलता की इच्छा होती है। प्रेम चाहिए, तो किसी के निकट जाने की इच्छा होती है। परंतु प्रश्न यह है कि इच्छा का स्रोत क्या है?
यह प्रश्न केवल मनोविज्ञान या जीवविज्ञान का नहीं, बल्कि दर्शन, अध्यात्म और मानव अस्तित्व का मूल प्रश्न है।
इच्छा: जीवन का इंजन
यदि संसार से सारी इच्छाएँ समाप्त हो जाएँ, तो क्या होगा?
न कोई पढ़ना चाहेगा, न कमाना, न प्रेम करना, न परिवार बनाना, न कला रचना, न विज्ञान करना। जीवन ठहर जाएगा।
इच्छा ही वह शक्ति है जो मनुष्य को क्रिया की ओर धकेलती है। हर कर्म के पीछे किसी न किसी रूप में इच्छा उपस्थित होती है।
इस अर्थ में इच्छा जीवन का इंजन है।
विज्ञान क्या कहता है?
आधुनिक विज्ञान इच्छा को मस्तिष्क और विकासवाद (Evolution) के संदर्भ में समझाता है।
लाखों वर्षों के विकास में वे जीव अधिक सफल रहे जो भोजन खोजने, खतरे से बचने और प्रजनन करने के लिए प्रेरित थे। इसलिए प्रकृति ने ऐसे जैविक तंत्र विकसित किए जो कुछ कार्यों को सुखद और कुछ को कष्टदायक बनाते हैं।
जब हम भोजन करते हैं, प्रेम प्राप्त करते हैं या कोई लक्ष्य हासिल करते हैं, तो मस्तिष्क में रासायनिक प्रक्रियाएँ सक्रिय होती हैं। यही प्रक्रियाएँ हमें कुछ चीज़ों की ओर आकर्षित करती हैं।
लेकिन यहाँ एक समस्या है।
विज्ञान यह तो बता देता है कि इच्छा कैसे काम करती है, पर यह नहीं बताता कि इच्छा का अंतिम कारण क्या है।
शोपेनहावर: संसार के मूल में इच्छा
जर्मन दार्शनिक Arthur Schopenhauer ने एक क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार संसार के मूल में पदार्थ, ईश्वर या तर्क नहीं, बल्कि “Will” (इच्छा) है।
वे कहते हैं कि मनुष्य सोचता है कि वह तर्क के आधार पर निर्णय लेता है, लेकिन वास्तविकता में उसकी बुद्धि अक्सर उसकी इच्छाओं की सेवा करती है।
हम पहले चाहते हैं, फिर अपने चाहने के लिए तर्क खोजते हैं।
शोपेनहावर के अनुसार पूरी प्रकृति में एक अंधी, निरंतर आगे बढ़ती हुई इच्छा काम कर रही है — जीवित रहने की, बढ़ने की और स्वयं को व्यक्त करने की।
बौद्ध दृष्टिकोण: इच्छा और दुःख
बौद्ध दर्शन इच्छा को एक अलग दृष्टि से देखता है।
Gautama Buddha के अनुसार दुःख का मुख्य कारण तृष्णा (Craving) है।
हम वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों को स्थायी मान लेते हैं। फिर उन्हें प्राप्त करने या बनाए रखने की इच्छा उत्पन्न होती है। जब वास्तविकता हमारी अपेक्षाओं के अनुसार नहीं चलती, तो दुःख जन्म लेता है।
बौद्ध दृष्टि में प्रश्न यह नहीं है कि इच्छा कहाँ से आती है, बल्कि यह है कि इच्छा हमें कैसे बाँधती है और उससे मुक्ति कैसे संभव है।
वेदांत: सृष्टि की पहली हलचल
भारतीय दर्शन में एक अत्यंत रोचक विचार मिलता है।
कुछ उपनिषदों में सृष्टि की उत्पत्ति को एक प्रकार की आद्य इच्छा से जोड़ा गया है।
एक प्रसिद्ध वाक्य है:
“एकोऽहम् बहुस्याम्”
“मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ।”
यह कोई मानव जैसी इच्छा नहीं है, बल्कि अस्तित्व के प्रकट होने की पहली हलचल है। यहाँ इच्छा को सृष्टि की रचनात्मक शक्ति के रूप में देखा गया है।
क्या प्रकृति चाहती है कि जीवन आगे बढ़े?
जब हम देखते हैं कि लगभग हर जीव भोजन करता है, संघर्ष करता है, साथी खोजता है और संतति उत्पन्न करता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं जीवन को आगे बढ़ाना चाहती हो।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह “चाहना” नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया का परिणाम है।
लेकिन दार्शनिक दृष्टि से कुछ लोग कहते हैं कि जीवन में एक अंतर्निहित प्रवृत्ति है — स्वयं को बनाए रखने और विस्तार देने की।
यही कारण है कि प्रेम, महत्वाकांक्षा, जिज्ञासा और सृजनशीलता जैसे अनुभव मानव जीवन में इतनी गहराई से उपस्थित हैं।
सबसे कठिन प्रश्न
मान लीजिए हम कहें:
- इच्छा मस्तिष्क से आती है।
- मस्तिष्क विकासवाद का परिणाम है।
- विकासवाद प्रकृति के नियमों से संचालित है।
तब भी प्रश्न बचा रहता है:
प्रकृति के नियम ऐसे क्यों हैं?
यदि हम कहें इच्छा ईश्वर से आती है, तो प्रश्न उठता है:
ईश्वर ने इच्छा क्यों की?
हर उत्तर के पीछे एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है।
यही कारण है कि इच्छा का अंतिम स्रोत आज भी एक रहस्य बना हुआ है।
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