अस्तित्ववाद एक दार्शनिक और नैतिक विचारधारा है, जिसके अनुसार मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है, फिर अपने कर्मों और निर्णयों से अपना स्वरूप (Essence) स्वयं बनाता है। अर्थात् व्यक्ति अपने जीवन के अर्थ, मूल्यों और उद्देश्य का स्वयं निर्माता होता है।
प्रमुख विचारक
- Jean-Paul Sartre
- Søren Kierkegaard
आधार
मनुष्य स्वयं अपने मूल्यों का स्रष्टा है।
कोई सार्वभौमिक नियम या पूर्वनिर्धारित उद्देश्य व्यक्ति के जीवन को नहीं चलाता; व्यक्ति अपने चुनावों से स्वयं को परिभाषित करता है।
सही (Right)
प्रामाणिक (Authentic) चुनाव करना, अर्थात् अपने विवेक, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के आधार पर निर्णय लेना।
गलत (Wrong)
बुरी नीयत (Bad Faith) से जीना — अर्थात् अपनी स्वतंत्रता और जिम्मेदारी से बचना, केवल समाज, परंपरा या दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार चलना, और स्वयं के वास्तविक स्वरूप से भागना।
उदाहरण
मान लीजिए किसी व्यक्ति के परिवार वाले चाहते हैं कि वह डॉक्टर बने, लेकिन उसकी रुचि संगीत में है।
- अस्तित्ववाद के अनुसार उसे अपने वास्तविक विश्वास और रुचि के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।
- यदि वह केवल दूसरों को खुश करने के लिए डॉक्टर बनता है, तो यह “Bad Faith” (बुरी नीयत) माना जा सकता है।
- यदि वह अपने निर्णय की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए संगीत को चुनता है, तो यह प्रामाणिक (Authentic) चुनाव होगा।
मुख्य विशेषताएँ
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर
- व्यक्तिगत जिम्मेदारी का महत्व
- जीवन का अर्थ स्वयं निर्मित करना
- प्रामाणिकता (Authenticity) को नैतिक आदर्श मानना
- पूर्वनिर्धारित नियमों और मूल्यों पर प्रश्न उठाना
एक पंक्ति में
अस्तित्ववाद के अनुसार मनुष्य स्वतंत्र है, अपने मूल्यों का स्वयं निर्माता है, और उसे अपने निर्णयों की पूर्ण जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए प्रामाणिक जीवन जीना चाहिए।