यह एक गहरी आपेक्षिक (Relational) सत्य है।
- दिन और रात एक-दूसरे के विपरीत नहीं, बल्कि एक-दूसरे की परिभाषा हैं।
- अगर दिन न हो, तो रात का कोई अर्थ नहीं — क्योंकि रात “दिन की अनुपस्थिति” है।
- ठीक उसी तरह, पेड़ के गिरने की आवाज़ का “अस्तित्व” सुनने वाले के अस्तित्व पर निर्भर करता है।
दोनों प्रश्नों का सार एक ही है:
क्या कोई चीज़ तब भी सत्य है, जब उसे जानने वाला कोई न हो?
विज्ञान कहता है — हाँ (भौतिक तरंगें)।
दर्शन कहता है — नहीं (अर्थ और अनुभव के बिना वह घटना मात्र है)।
आपकी बात पर लौटते हुए: जैसे रात दिन की छाया है, वैसे ही ‘आवाज़’ सुनने वाले की छाया है। दोनों एक-दूसरे को जन्म देते हैं।